भारत विरोधी ग्रंथि के शिकार दुर्रानी

विवेक काटजू
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी को अब वही सेना लगातार तंग कर रही है, जिसमें उन्होंने विशिष्टता पूर्ण सेवा निभाई थी, हालांकि काफी विवादित भी रहे थे। विगत और वर्तमान में दुर्रानी और सैन्य नेतृत्व एक-दूसरे पर जो आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं, उसकी गाथा रोचक है। सबसे महत्वपूर्ण यह प्रसंग भारत के सामरिक विशेषज्ञों की उस धारणा को तस्दीक करता है कि पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ जनरल यह उम्मीद करते हैं कि उनकी बिरादरी के सेवानिवृत्त सदस्य पूर्व-निर्धारित संहिता या परिपाटी के मुताबिक चलें, खासकर भारतीयों से व्यवहार करते वक्त।
जो जनरल फिलहाल नौकरी में हैं, भले ही वे अपने सेवानिवृत्त हमबिरादर की इज्जत करें लेकिन उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं कि उनमें से एक रहा कोई भारतीयों के साथ मिलकर किसी बौद्धिक उद्यम में बेरोकटोक साझेदारी करे। यही वह सबसे बड़ा पाप है जो असद दुर्रानी उस वक्त कर बैठे जब उन्होंने भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के पूर्व मुखिया अमरजीत सिंह दुलत, जो 1990 के दशक के आखिर में इस एजेंसी के निदेशक थे, बतौर सह-लेखक किताब प्रकाशित की। द स्पाई क्रोनीकल्स नामक यह पुस्तक, जो भले ही अंदर से राज़ों से भूचाल लाने वाली नहीं थी, लेकिन भारत-पाक संबंधों समेत जिन विषयों का इसमें जिक्र है, उसके आधार पर यह किताब असाधारण थी। इससे पाकिस्तानी सेना को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है क्योंकि खुलासों से फौज के आलोचक, विशेषकर नवाज़ शरीफ, दावा करने लगे कि फौज अपने पूर्व सहयोगियों और अन्य की राष्ट्रभक्ति को लेकर दोहरे मापदंड रखे हुए है। इस वजह से दुर्रानी पर जुर्माने और वर्जनाएं नाजिल कर दिए गए हैं। उनका नाम निर्गमन सूची में डाल दिया है ताकि वे देश छोड़कर न जा सकें। यह रोक जारी रही और अपना नाम कटवाने के लिए दुर्रानी को अदालत की शरण लेनी पड़ी है।
कुछ दिन पहले सरकार ने दुर्रानी की याचिका पर पंक्ति-ब-पंक्ति अपना जवाब जमा करवाया है। पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक सरकारी उत्तर में दुर्रानी द्वारा दायर राहत का विरोध इस आधार पर किया गया है कि उन्होंने वर्ष 2008 में रॉ समेत दुश्मन तत्वों के साथ मेलजोल रखा है। दुर्रानी ने कुछ माह पहले एक पत्र अनेक विभागों को लिखा था, जिसकी एक प्रति मीडिया के हाथ लग गई। उसमें कहा गया है कि पहले के सरकारी वकीलों ने अदालत को बताया था कि मैं रॉ के साथ वर्ष 2008 से जुड़ा हूं। चूंकि शब्द ‘जुड़ा और ‘मेलजोल रखने के अनेकानेक शब्दार्थ निकलते हैं, सो अब सेना ने आरोप में शब्द मेलजोल इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा आरोप पत्र में रॉ के अतिरिक्त जिन अन्य दुश्मन तत्वों का जिक्र किया जा रहा है, उनके बारे में नहीं बताया गया है। जबकि सरकारी आरोप में यह कहा जा रहा है कि दुर्रानी का ‘मेलजोल ‘रॉ से रहा है तो इस बात की संभावना कम ही है कि उन्होंने ऐसा एक संस्थान के स्तर पर किया होगा। हो सकता है कि वे सेवानिवृत्त ‘रॉ अधिकारी से अनाधिकारिक मौकों पर मिले हों और कभी-कभार सेवारत अधिकारियों से भी बात की हो।
अदालत में सरकार द्वारा दिए गए जवाब में शब्द ‘मेलजोल कहा गया है। हालांकि इसका सटीक निहितार्थ क्या है, उसकी व्याख्या नहीं की गई है। किंतु कुछ तार्किक अर्थ निकाले जा सकते हैं। अगर दुर्रानी ने ‘दुश्मन तत्वोंÓ के साथ गलत भावना के साथ ‘मेलजोल रखा होता, खासकर ‘रॉ के साथ, तो जाहिर है, उन पर पाकिस्तान के आपराधिक कानूनों के तहत मुकदमा दर्ज होता, न कि महज अवांछित व्यवहार या फिर पेंशन नियमों की अवहेलना जैसे मामूली दोषों पर। ‘मेलजोल रखने का सीधा या परोक्ष मतलब जासूसी करना कतई नहीं होता। जासूसी तब मानी जाती जब वे ‘रॉसमेत ‘दुश्मन तत्वों के लिए काम कर रहे होते और गुप्त जानकारी खुद या अपने एजेंटों के माध्यम से मुहैया करवा रहे होते। यह एक आपराधिक गतिविधि है। दूसरी ओर, ‘मेलजोल शब्द में आमतौर पर किसी के साथ विचार, अक्स, खुले स्रोतों पर उपलब्ध सूचनाएं, अनुभव इत्यादि का आदान-प्रदान करना जैसा आम व्यवहार आता है। इस तरह के संबंध से एक-दूसरे की व्यवस्था के कामकाज को नजदीक से जानने, प्रेरणास्पद समझ और चारित्रिक व्यवहार जानने का मौका मिलता है। कई बार यह प्रक्रिया आपसी संशय और कटुता मिटाने में सहायक सिद्ध होती है। तथापि, अधिकांशत: इस तरह के ‘मेलजोलÓ से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता और उपलब्धि नगण्य रहती है क्योंकि लंबे समय से एक-दूसरे को विरोधी समझने वालों के बीच का दुराव और मनोवृत्ति इतनी आसानी से नहीं जाती।
विदेशी अधिकारियों से ‘मेलजोलÓ रखते वक्त किन बातों का ध्यान रखना है, इसके लिए दुनियाभर की सरकारों की आचार संहिता हुआ करती है। इसके जरिए सुनिश्चित किया जाता है कि अनजाने में भी कोई ऐसी मौजूदा सूचना बाहर न निकलने पाए जो देश हित के विरुद्ध हो। लेकिन यह बात दुर्रानी के मामले पर लागू नहीं होती क्योंकि उन्हें सेवानिवृत्त हुए पंद्रह साल से ज्यादा हो गए थे जब ‘रॉÓ से मेलजोल का आरोप जड़ा गया। संक्षेप में पाकिस्तानी सेना को इतना ज्यादा शक रहता है, खासकर भारत को लेकर कि वह नहीं चाहती कोई अफसर ‘दुश्मन तत्वोंÓ से मिले-जुले, भले ही वह काफी पहले सेवानिवृत्त क्यों न हो चुका हो।
दुर्रानी का यह दावा कि उनके खिलाफ सेना के निरंतर आक्रामक बने रहने के पीछे का कारण मेरा यह विचार व्यक्त करना है कि मई 2010 में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान में अमेरिका ने पाकिस्तान को प्रक्रिया में साथ रखा था। हालांकि पाकिस्तान ने अपनी भागीदारी से साफ इनकार करना चुना था और घटना को केवल अपनी चूक तक सीमित रखने को तरजीह दी थी। यह बात अलग है कि दुर्रानी ने अपनी कही बात को सिद्ध करने के लिए कोई पुख्ता सबूत देना तो क्या, कोई प्रामाणिक तर्क तक नहीं दिए थे। बेशक अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सौदेबाजी की थी और भारी धन की एवज में अल-कायदा के सैकड़ों निम्नस्तरीय कारकुन उसके हवाले कर दिए गए थे। तथापि प्रथम दृष्टया यह विश्वास करना मुश्किल है कि ओसामा बिन लादेन को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तानी व्यवस्था पर कभी भरोसा रखा होगा। शायद पाकिस्तानी जनरल इस बात पर दुर्रानी से ज्यादा खफा हैं कि एक पूर्व आईएसआई मुखिया की कही बातें उन पर सीधी चोट हैं क्योंकि वे, जो खुद को पाकिस्तान की ‘इज्जतÓ और ‘वकारÓ का सबसे बड़ा अलंबरदार मानते हैं, उन्होंने देश को बेइज्जत करवाने वाले कामों में समझौते किए हैं।
दुर्रानी की एक अन्य कड़वाहट भरी शिकायत यह है कि मौजूदा सेनाध्यक्ष कमर बाजवा अपनी रेजीमेंट से संबंधित पूर्व सेना मुखिया असलम बेग से सहानुभूति रखने की वजह से भी उनके पीछे पड़े हैं। तीन दशक पहले दुर्रानी और बेग ने खुद के पास उपलब्ध फंड का उपयोग पाकिस्तानी आम चुनाव में दखलअंदाजी करने के लिए किया था। इन दोनों के खिलाफ केस दर्ज हुआ था, जो आज भी चल रहा है, और बेग किसी हीले-हवाला सारा दोष दुर्रानी पर मढ़कर खुद बच निकलना चाहता है।
दुर्रानी कहते हैं : ‘जो कोई भी रास्ता मैं अपनाऊंगा, उसमें मुझे शारीरिक और जानी नुकसान का खतरा है।Ó तथ्य तो यह है कि मान कर चला जाए कि सेना मुख्यालय बदले की कार्रवाई जरूर करेगा। तो क्या पाकिस्तानी सेना और इटैलियन माफिया कोसा नोस्त्रा के छुपकर वार किए जाने वाले हमलों के तौर-तरीके में कोई फर्क है

 

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